Justice Yashwant Verma: सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा को बड़ा झटका देते हुए उनके खिलाफ गठित महाभियोग जांच समिति को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने 8 जनवरी को फैसला सुरक्षित रखने के बाद यह निर्णय सुनाया।
पीठ ने स्पष्ट किया कि लोकसभा अध्यक्ष द्वारा जांच समिति के गठन में किसी भी प्रकार की अवैधता नहीं पाई गई है। अदालत ने कहा कि जस्टिस वर्मा किसी भी तरह की राहत के हकदार नहीं हैं और इस मामले में न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि ऐसे मामलों में उन न्यायाधीशों के अधिकारों और उन सांसदों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है, जिन्हें कानून के तहत महाभियोग प्रस्ताव लाने और उसे स्वीकार कराने का अधिकार प्राप्त है।
Justice Yashwant Verma: याचिका में क्या दलील दी गई थी?
जस्टिस वर्मा की ओर से दायर याचिका में कहा गया था कि 21 जुलाई को लोकसभा और राज्यसभा, दोनों सदनों में एक ही दिन महाभियोग प्रस्ताव पेश किए गए थे। इसके बावजूद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने राज्यसभा अध्यक्ष के फैसले का इंतजार किए बिना ही जांच समिति का गठन कर दिया। याचिका में इसे जज (इंक्वायरी) एक्ट, 1968 की धारा 3(2) का उल्लंघन बताया गया था।
Justice Yashwant Verma: पूरा मामला क्या है?
21 जुलाई 2025 को जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ लोकसभा और राज्यसभा में अलग-अलग महाभियोग प्रस्ताव पेश किए गए थे। उसी दिन तत्कालीन राज्यसभा अध्यक्ष जगदीप धनखड़ ने इस्तीफा दे दिया था। बाद में 11 अगस्त को राज्यसभा के उपसभापति ने राज्यसभा में लाए गए प्रस्ताव को खारिज कर दिया। इसके अगले ही दिन, 12 अगस्त को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने जांच के लिए एक तीन सदस्यीय समिति के गठन की घोषणा की, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार, एक हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एम.एम. श्रीवास्तव और वरिष्ठ अधिवक्ता बी.वी. आचार्य शामिल हैं।
दरअसल, 14 मार्च 2025 को जस्टिस वर्मा के आवास में आग लगने की घटना के दौरान दमकलकर्मियों को बड़ी मात्रा में नकदी मिलने का दावा किया गया था, जिसके बाद उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। हालांकि जस्टिस वर्मा ने सभी आरोपों से इनकार किया है। इसके बावजूद उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट ट्रांसफर कर दिया गया था और आगे की कार्रवाई पर विचार होने तक उनसे न्यायिक कार्य भी वापस ले लिया गया था।
अब सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग जांच समिति का रास्ता साफ हो गया है।